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खुशहाली का कारण - Sant Vaani-100


 जय श्री सच्चिदानंद जी

जापान के टोक्यो शहर के निकट एक कस्बा अपनी खुशहाली के लिए प्रसिद्द था | एक बार एक व्यक्ति उस कसबे की खुशहाली का कारण जानने के लिए सुबह -सुबह वहाँ पहुंचा | कस्बे में घुसते ही उसे एक कॉफ़ी -शॉप दिखायी दी।उसने मन ही मन सोचा कि मैं यहाँ बैठ कर चुप -चाप लोगों को देखता हूँ , और वह धीरे - धीरे आगे बढ़ते हुए शॉप के अंदरलगी एक कुर्सी पर जा कर बैठ गया |

कॉफ़ी-शॉप शहर के रेस्टोरेंटस की तरह ही थी ,पर वहाँ उसे लोगों का व्यवहार कुछ अजीब लगा |

एक आदमी शॉप में आया और उसने दो कॉफ़ी के पैसे देते हुए कहा , “ दो कप कॉफ़ी , एक मेरे लिए और एक उस दीवार पर। ”

व्यक्ति दीवार की तरफ देखने लगा लेकिन उसे वहाँ कोई नज़र नहीं आया ,पर फिर भी उस आदमी को कॉफ़ी देने के बाद वेटर दीवार के पास गया और उस पर कागज़ का एक टुकड़ा चिपका दिया , जिसपर “एक कप कॉफ़ी ” लिखा था |

व्यक्ति समझ नहीं पाया कि आखिर माजरा क्या है . उसने सोचा कि कुछ देर और बैठता हूँ ,और समझने की कोशिश करता हूँ |

थोड़ी देर बाद एक गरीब मजदूर वहाँ आया, उसके कपड़े फटे -पुराने थे पर फिर भी वह पुरे आत्म -विश्वास के साथ शॉप में घुसा और आराम से एक कुर्सी पर बैठ गया |

व्यक्ति सोच रहा था कि एक मजदूर के लिए कॉफ़ी पर इतने पैसे बर्वाद करना कोई समझदारी नहीं है …

तभी वेटर मजदूर के पास आर्डर लेने पंहुचा .“ सर , आपका आर्डर प्लीज !”, वेटर बोला |
“ दीवार से एक कप कॉफ़ी .” , मजदूर ने जवाब दिया |
वेटर ने मजदूर से बिना पैसे लिए एक कप कॉफ़ी दी और दीवार पर लगी ढेर सारे कागज के टुकड़ों में से “एक कप कॉफ़ी ” लिखा एक टुकड़ा निकाल कर डस्टबिन में फेंक दिया |

व्यक्ति को अब सारी बात समझ आ गयी थी |कसबे के लोगों का ज़रूरतमंदों के प्रति यह रवैया देखकर वह भाव- विभोर हो गया … उसे लगा , सचमुच लोगों ने मदद का कितना अच्छा तरीका निकाला है जहां एक गरीब मजदूर भी बिना अपना आत्मसम्मान कम किये एक अच्छी सी कॉफ़ी -शॉप में खाने -पीने का आनंद ले सकता है | अब वह कसबे की खुशहाली का कारण जान चुका था और इन्ही विचारों के साथ वापस अपने शहर लौट गया

जय श्री सच्चिदानंद जी

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सुन्दर तस्वीर - Beautiful Painting (Sant Vaani - 99)


जय श्री सच्चिदानंद जी

एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था । चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनाई और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को , जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे । जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी । यह देख वह बहुत दुखी हुआ । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था । तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई । उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे । उसने अगले दिन यही किया । शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया । वह संसार की रीति समझ गया ।

"कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान , लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता है"

जय श्री सच्चिदानंद जी

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Sant Vaani - 98 (कर्त्तव्य - Duty)


जय श्री सच्चिदानंद जी

एक संत बियाबान में झोपडी बना कर रहते थे।  वे रह से गुजरने वाले पथिकों की सेवा करते और भूखों को भोजन कराया करते थे।  एक दिन एक बूढ़ा व्यक्ति उस राह से गुजरा।  उन्होंने हमेशा की तरह उसे विश्राम करने को स्थान दिया और फिर खाने की थाली उसके आगे रख दी।  बूढे  व्यक्ति ने बिना प्रभु स्मरण किये भोजन प्रारम्भ कर दिया।  जब संत ने उन्हें याद दिलाया तो वे बोले - मैं किसी भगवान को नहीं मानता। 

यह सुनकर संत को क्रोध आ गया और उन्होंने बूढ़े व्यक्ति के सामने से भोजन की थाली खीचकर उसे भूखा ही विदा कर दिया।  उस रात उन्हें स्वप्न में भगवान के दर्शन हुए।  

भगवान बोले - पुत्र ! उस वृद्ध व्यक्ति के साथ तुमने जो व्यव्हार किया, उससे मुझे बहुत दुःख हुआ।  

संत ने आश्चर्य से पूछा - प्रभु! मैंने तो ऐसा इसलिए किया कि उसने आपके लिए अपशब्दों का प्रयोग किया।  

भगवान बोले - उसने मुझे नहीं माना तो भी मैंने उसे आज तक भूखा नहीं सोने दिया और तुम उसे एक दिन का भी भोजन नहीं करा सके।  

यह सुनकर संत की आँखों में अश्रु आ गए और स्वप्न टूटने के साथ उनकी आँखें भी खुल गयीं।  

जय श्री सच्चिदानंद जी 


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Sant Vaani - 97 (कोहिनूर और पानी की बून्द - Kohinoor and water drop)


जय श्री  सच्चिदानंद जी 

एक व्यापारी रेगिस्तान के रास्ते से व्यापार कर के लौट रहा था।  उसने अपनी झोली में कई कीमती हीरे जवाहरात आदि भर रखे थे।  कुछ शुभचिंतकों ने उसे समझाया कि वो अपना कुछ भार हल्का कर दे और मोतियों के बदले पानी की चिश्तियां बाँध ले।  

उसने उनकी राय पर ध्यान न देकर यात्रा जारी रखी।  दुर्योग से वो रास्ता भटक गया।  साथ में लाई रसद व् भोजन सामग्री धीरे धीरे समाप्त हो गयी।  वह भूखा-प्यासा निढाल पड़ा था तब रत्नों-मणिकों के वजन को देखकर उसे अनुभव हुआ कि जीवन में जीवन से ज्यादा बहुमूल्य और कुछ भी नहीं।  हीरे-मोतियों की चमक थोड़ी देर का आकर्षण जरूर प्रस्तुत करती है, पर कठिन समय में पानी की एक बून्द के सामने कोहिनूर की कीमत भी एक पत्थर से ज्यादा नहीं।  

जय श्री सच्चिदानंद जी

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