Latest Jobs :
Recently Added

एक कड़वी हकीकत - A Bitter Reality



जय श्री  सच्चिदानंद जी

 समाज की एक कड़वी हकीकत:-

जिसके गवाह हम सब हैं, जिसके जिम्मेदार हम सब हैं।

यह दर्दनाक घटना एक परिवार की है। जिसमें परिवार का मुखिया, उसकी पत्नी और दो बच्चे थे। जो जैसे तैसे अपना जीवन घसीट रहे थे।
.
घर का मुखिया एक लम्बे अरसे से बीमार था। जो जमा पूंजी थी वह डॉक्टरों की फीस और दवाखानों पर लग चुकी थी। लेकिन वह अभी भी चारपाई से लगा हुआ था। और एक दिन इसी हालत में अपने बच्चों को अनाथ कर इस दुनिया से चला गया।


रिवाज के अनुसार तीन दिन तक पड़ोस से खाना आता रहा, पर चौथे दिन भी वह मुसीबत का मारा परिवार खाने के इन्तजार में रहा मगर लोग अपने काम धंधों में लग चुके थे, किसी ने भी इस घर की ओर ध्यान नहीं दिया।
 

बच्चे अक्सर बाहर निकलकर सामने वाले सफेद मकान की चिमनी से निकलने वाले धुएं को आस लगाए देखते  रहते। नादान बच्चे समझ रहे थे कि उनके लिए खाना तयार हो रहा है। जब भी कुछ क़दमों की आहत आती उन्हें लगता कोई खाने की थाली ले आ रहा है। मगर कभी भी उनके दरवाजे पर दस्तक न हुयी। 

माँ तो माँ होती है, उसने घर से रोटी के कुछ सूखे टुकड़े ढूंढ कर निकाले। इन टुकड़ों से बच्चों को जैसे तैसे बहला फुसला कर सुला दिया।
.
अगले दिन फिर भूख सामने खड़ी थी। घर में था ही क्या जिसे बेचा जाता, फिर भी काफी देर "खोज" के बाद चार
चीजें निकल आईं। जिन्हें बेच कर शायद दो समय के भोजन की व्यवस्था हो गई। बाद में वह पैसा भी खत्म हो गया तो जान के लाले पड़ गए।
 

भूख से तड़पते बच्चों का चेहरा माँ से देखा नहीं गया। सातवें दिन विधवा माँ ही बड़ी सी चादर में मुँह लपेट कर मुहल्ले की पास वाली दुकान पर जा खड़ी हुई। दुकानदार से महिला ने उधार पर कुछ राशन माँगा तो दुकानदार ने साफ इनकार ही नहीं किया बल्कि दो चार बातें भी सुना दीं।
 

उसे खाली हाथ ही घर लौटना पड़ा। एक तो बाप के मरने से अनाथ होने का दुख और ऊपर से लगातार भूख से तड़पने के कारण उसके सात साल के बेटे की हिम्मत जवाब दे गई और वह बुखार से पीड़ित होकर चारपाई पर पड़ गया। 

बेटे के लिए दवा कहाँ से लाती, खाने तक का तो ठिकाना था नहीं। तीनों घर के एक कोने में सिमटे पड़े थे। माँ बुखार से आग बने बेटे के सिर पर पानी की पट्टियां रख रही थी, जबकि पाँच साल की छोटी बहन अपने छोटे हाथों से भाई के पैर दबा रही थी। 


अचानक वह उठी, माँ के कान से मुँह लगा कर बोली "माँ भाई कब मरेगा???"
 

माँ के दिल पर तो मानो जैसे तीर चल गया, तड़प कर उसे छाती से लिपटा लिया और पूछा "मेरी बच्ची, तुम यह
क्या कह रही हो?"


बच्ची मासूमियत से बोली,


"हाँ माँ ! भाई मरेगा तो लोग खाना देने आएँगे ना???"---------
---
.
कृपया किसी असहाय भूखे को खाना खिलाकर पुण्य प्राप्त करें।


जय श्री  सच्चिदानंद जी
{[['']]}

आपके कर्म - Your Karma


जय श्री सच्चिदानंद जी

एक संत थे जिनका नाम था जगन्नाथदास महाराज। वे भगवान को प्रीतिपूर्वक भजते थे। वे जब वृध्द हुए तो थोड़े बीमार पड़ने लगे। उनके मकान की ऊपरी मंजिल पर वे स्वयं और नीचे उनके शिष्य रहेते थे। रात को एक-दो बार बाबा को दस्त लग जाती थी, इसलिए "खट-खट" की आवाज करते तो कोई शिष्य आ जाता और उनका हाथ पकड़कर उन्हें शौचालय ले जाता। बाबा की सेवा करने वाले वे शिष्य जवान लड़के थे।

एक रात बाबा ने खट-खटाया तो कोई आया नही। बाबा बोले- "अरे, कोई आया नही ! बुढापा आ गया, प्रभु !"
इतने में एक युवक आया और बोला "बाबा ! मैं आपकी सहायता करता हूं"

बाबा का हाथ पकड़कर वह उन्हें शौचालय मै ले गया। फिर हाथ-पैर धुलाकर बिस्तर पर लेटा दिया।

जगन्नाथदासजी बोले "यह कैसा सेवक है की इतनी जल्दी आ गया ! इसके स्पर्ष से आज अच्छा लग रहा है, आनंद ही आनंद आ रहा है"।

जाते-जाते वह युवक पुनः लौटकर आ गया और बोला "बाबा! जब भी तुम्ह ऐसे 'खट-खट' करोगे न, तो मैं आ जाया करूंगा। तुम केवल विचार भी करोगे की 'वह आ जाए' तो मैं आ जाया करूँगा"

बाबा: "बेटा तुम्हे कैसे पता चलेगा ?"

युवक: "मुझे पता चल जाता है"

बाबा: "अच्छा ! रात को सोता नही क्या?"

युवक: "हां, कभी सोता हूं, झपकी ले लेता हूं। मैं तो सदा सेवा मै रहता हूं"

जगन्नाथ महाराज रात को 'खट-खट' करते तो वह युवक झट आ जाता और बाबा की सेवा करता। ऐसा करते करते कई दिन बीत गए। जगन्नाथदासजी सोचते की 'यह लड़का सेवा करने तुरंत कैसे आ जाता है?'

एक दिन उन्होंने उस युवक का हाथ पकड़कर पूछा की "बेटा ! तेरा घर किधर है?"

युवक: "यही पास मै ही है। वैसे तो सब जगह है"

बाबा: "अरे ! ये तू क्या बोलता है, सब जगह तेरा घर है?"

बाबा की सुंदर समझ जगी। उनको शक होने लगा की कहीं यह मेरे भगवान् जगन्नाथ तो नहीं, जो किसी का बेटा नही लेकिन सबका बेटा बनने को तैयार है, बाप बनने को तैयार है, गुरु बनने को तैयार है, सखा बनने को तैयार है...'

बाबा ने कसकर युवक का हाथ पकड़ा और पूछा "सच बताओ, तुम कौन हो?"

युवक: "बाबा ! छोडिये, अभी मुझे कई जगह जाना है"

बाबा: "अरे ! कई जगह जाना है तो चले जाना, लेकिन तुम कौन हो यह तो बताओ"

युवक: "अच्छा बताता हूं" देखते-देखते भगवान् जगन्नाथ का दिव्य विग्रह प्रकट हो गया।

"देवाधिदेव! सर्वलोकेकनाथ ! सभी लोकों के एकमात्र स्वामी ! आप मेरे लिए इतना कष्ट सहते थे ! रात्रि को आना, शौचालय ले जाना, हाथ-पैर धुलाना..प्रभु ! जब मेरा इतना ख्याल रख रहे थे तो मेरा रोग क्यो नही मिटा दिया ?"

तब मंद मुस्कुराते हुए भगवान् जगन्नाथ बोले "महाराज !

तीन प्रकार के प्रारब्ध होते है: मंद, तीव्र और तर-तीव्र । मंद प्रारब्धतो सत्कर्म से, दान-पुण्य से भक्ति से मिट जाता है।

तीव्र प्रारब्ध अपने पुरुषार्थ और भगवान् के, संत

महापुरुषों के आशीर्वाद से मिट जाता है। परन्तु तर-

तीव्र प्रारब्ध तो मुझे भी भोगना पड़ता है।

रामावतार मै मैंने बाली को छुपकर बाण मारा था तो कृष्णावतार में उसने व्याध बनकर मेरे पैर में बाण मारा।
तर-तीव्र प्रारब्ध सभीको भोगना पड़ता है।

आपका रोग मिटाकर प्रारब्ध दबा दूँ, फिर क्या पता उसे भोगने के लिए

आपको दूसरा जन्म लेना पड़े और तब कैसी स्तिथि हो जाय? इससे तो अच्छा है अभी पुरा हो जाय... और मुझे 
आपकी सेवा करने में किसी कष्ट का अनुभव नही होता, भक्त तो मेरे मुकुटमणि, मैं भक्तन का दास"

"प्रभु ! प्रभु ! प्रभु ! हे देव हे देव ! ॥ "कहेते हुए जगन्नाथ दास महाराज भगवान के चरणों मै गिर पड़े और भावान्माधुर्य मै भागवत्शांती मै खो गए। भगवान अंतर्धान हो गए।

बोलिये जय श्री सच्चिदानंद जी
{[['']]}

गलती और भूल - Mistake and Forgiveness



जय श्री सच्चिदानंद जी

श्री सदगुरु प्रेमियों ,

हरेक भूल कुछ न कुछ शिक्षा देती है...............

1. भूल करके आदमी सीखता तो है, पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल ही करता जाए और कहे कि हम सीख रहे हैं।

2. पहले अपराध तो उनके हैं जो उन्हें करते हैं, दूसरे अपराध उनके हैं जो उन्हें होने देते हैं।

3. अपराध करने के पश्चात भय पैदा होता है और यही उसका दंड है।

4. गलती कर देना मामूली बात है, पर उसे स्वीकार कर लेना बड़ी बात है।

5. अन्याय करने वालों का अपराध जितना है, चुपचाप उसे बर्दाश्त करने वालों का अपराध क्या उससे कम है?

6. यदि मनुष्य सीखना चाहे तो उसकी हरेक भूल उसे कुछ न कुछ शिक्षा अवश्य दे सकती है।

7. भूल होना स्वाभाविक है, पर अवसर आने पर उसको सबके सामने मानने की हिम्मत करना महापुरुषों का ही काम है।

8. यदि हम पुरानी भूल को नई तरह से केवल दोहराते रहें तो इसमें कोई वास्तविक लाभ नहीं।

9. जो जान गया कि उससे भूल हो गई और उसे ठीक नहीं करता, वह एक और भूल कर रहा है।

10. अपने दोष को स्वीकारना कोई अपमान नहीं है।

11. भूल करना मनुष्य का स्वभाव है, की हुई भूल को मान लेना और इस तरह आचरण रखना कि जिससे वह भूल न होने पाए मर्दानगी है।

12. यदि कोई मनुष्य अपमानपूर्वक मुझे अमृत पिलाए तो वह मुझे अच्छा नहीं लगता। इससे तो अच्छा है कि वह मुझे सम्मानपूर्वक विष दे दे और मैं मर जाऊं।

13. मनुष्य को अपनी गलती निसंकोच स्वीकार कर लेनी चाहिए। हठ पकड़ कर और छल करके उसे छिपाना नहीं चाहिए। छिपाने से वह विष-कण के समान अपना प्रभाव बढ़ाती ही जाएगी।

जय श्री सच्चिदानंद जी 
{[['']]}

यह जीवन क्षण भंगुर है



जय श्री सच्चिदानंद जी

हमारा यह जीवन क्षण भंगुर है, जीवन कि स्थिति बिल्कुल ऐंसे ही है, जैसे पेड़ो पर लगे हुए पत्ते टूट कर बिखर जाएं तो वापिस डाल पर नही लगते, नदी का पानी जो आगे बह जाए वापिस नहीं आता, मुख से निकला हुआ साँस दुबारा वापिस नही आता, प्रभात के समय पेड़, पोधों के पत्तों पर पड़ी ओंस की बूंदे थोड़ी देर के लिये तो दिखाई देती हैं, कुछ क्षणों के बाद न जाने कहाँ विलीन हो जाती हैं । इस दुनियाँ में न जाने कितने कितने लोग आते हैं, अपनी-2 बोलियाँ बोलते हैं, अपना-2 कर्म करते है ओर फिर इस आसार संसार से ऐंसे विदाई ले लेते हैं कि जाने वाले के निशान भी दिखाई नहीं देते, कि जाने वाला गया तो गया कहाँ । घर में, परिवार में, रिशते नाते वाले लोग पुकारते रह जाते हैं लेकिन कोई आवाज़ सुनता ही नही ।
 
पर हम सब जानते हैं कि ज़िन्दगी का कोई भरोसा नही, लेकिन आशचर्यजनक बात यह है कि इस चीज़ को जानने के बाद भी मानने को तैयार नही होते, दूसरे को समझा रहे होते हैं कि ज़िन्दगी का कोई भरोसा नही, स्वयं के लिये तो हम यही बोलते है कि अभी तो दुनियाँ मे रहना है, हम अभी जाएं गे नही संसार से, जबकि एक झटका आ कर लगे, एक ठोकर आ कर लगे, यह सारा सजा सजाया महल टूट कर बिखर जाए गा। इसलिये कहा जाता है कि –
 
आदमी का जिस्म क्या है, जिस पे शैज़ा है जहाँ,
एक मिट्टी की इमारत, एक मिट्टी का मकां,
खून का गारा बना, ईंट जिस में हड्डियाँ
चन्द स्वाँसो पे खड़ा है ये ख्याले आशियाँ
मोत की पुरज़ोर आंधी जब इसे टकराए गी
देख लेना ये इमारत खाक में मिल जाएगी

जय श्री सच्चिदानंद जी 
{[['']]}




 
Desing and Developed By : INFOVISION MEDIA
Copyright © 2011. Shri Nangli Sahib Darbar (Bhajan and Satsang) - All Rights Reserved
Supported by WWW.BAZAAR99.COM
Proudly powered by WWW.REDPC.IN