Honesty - ईमानदारी


क्या हम  परेशान हैं? हमारे परिवार में कोई परेशानी हैं? घर पर बीमारियां पैर पसारे बैठी है।  कितना भी इलाज़ कराया लेकिन कोई फायेदा नहीं।  अच्छे से अच्छे डॉक्टर और अस्पताल में भी इलाज़ करा कर थक चुके हैं लेकिन कुछ फायेदा नहीं हो रहा है।  

कुछ बीमारियां ऐसी होती है जिनको डॉक्टर्स भी समझ नहीं पाते।  साइंस की भी सभी मशीनरी भी बेकार हो जाती है।  ऐसा क्यूँ? कभी सोचा है।  कहीं ऐसा तो नहीं कि बिमारी के बहाने से अस्पताल में लगने वाला पैसा हमारा है ही नहीं। वो कर्ज हैं जो हम लोग चुका रहे हैं।  यकीन करना मुश्किल है लेकिन ये सच हो सकता हैं।

लेकिन इसकी वजह है।  जब हम पूजा या सिमरन करते है।  सिमरन के समय लगता है कि हमारे गुरु महाराज हमारे सामने है।  ये सच भी है अगर सच्चे मन से सिमरन किया जाये तो प्रभु साक्षात् हमारे सामने ही होते है।  सिमरन होते ही हमारी प्रार्थना होती है कि हम और हमारा परिवार खुश रहे।  सदा गुरु चरणों में लगा रहे।  अब ये प्रार्थना तो कबूल होनी ही है क्यूंकि गुरु भक्तों के साथ गुरु महाराज हमेशा रहते हैं।  

लेकिन वही सिमरन-भजन ख़त्म होते ही हम लोग सोचते हैं कि सुबह का एक काम ख़त्म हुआ और निकल पड़ते हैं दुनिया की भीड़ में।  भीड़ में शामिल होते ही हम लोग ये भूल जाते है कि गुरु महाराज वहाँ भी हमारे  साथ है।  अब जो भी दिन भर हम करते हैं, अच्छा या बुरा, ये ध्यान में नहीं रखते कि गुरु महाराज उस समय भी आपके साथ हैं और जो भी हम कर रहे हैं उसका पूरा हिसाब किताब उनके पास है।  

अगर दिन भर में आपने 1000 रुपए भी कमा लिए चाहे वो किसी भी तरीके से क्यों ना कमा लिए हो हम सोचते हैं कि वो आपका हैं।  लेकिन अगर उस पैसे में थोडा सा भी हिस्सा बेईमानी से आया है तो वही से हमारे दुःख शुरू हो जाते हैं।  प्रभु सब देख रहे हैं।  पूरा हिसाब है उनके पास।  उन 1000 रुपए में कितना हमारा है और कितना किसी और का।  

हम जब सिमरन करते हैं या कोई अच्छा काम करते हो तो भगवान् से प्रार्थना करते हैं कि हमारा ध्यान रखे, मतलब जो आपने किया उसका फल आपको चाहिए। लेकिन सिमरन तो कर लिया, प्रभु को साथ भी रख लिया लेकिन ये भूल गए कि अच्छे और बुरे दोनों कामों का फल मिलता हैं। अब अगर हमने अपनी ईमानदारी और मेहनत से धन कमाया हैं तो सब हमारा है।  और जो हमारा हैं वो हमारे पास ही रहेगा।  लेकिन अगर उसमे बेईमानी का हिस्सा है तो वो भी प्रभु ने देखा है।  वो तो आपको वापस करना ही पड़ेगा।  अब वापस करने का तरीका प्रभु क्या अपनाते हैं ये हम लोग नहीं समझ सकते।  लेकिन अगर हम ध्यान दें तो महसूस कर सकते हैं। 

लेकिन ऐसे धन को उपयोग करने वाले सभी लोगो दुःख के भागी होते हैं।  अब वो हम भी हो सकते और हमारा परिवार भी।  बेशक ये धन हमारे परिवार के सदस्यों ने नहीं कमाया लेकिन जाने अनजाने वो भी इसको उपयोग करते है क्यूंकि ये धन उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए ही कमाया गया हैं। 

अब यहाँ हमारे साथ घटी एक सच्ची घटना बताना जरूरी है।  वैसे हमारे साथ चमत्कार होते रहते हैं लेकिन ये घटना यहाँ बताना ठीक होगा।  

हमारा अपना कंप्यूटर का कारोबार हैं।  एक दिन एक जानकार सज्जन हमारी दुकान पर आये और एक कंप्यूटर खरीद लिया।  नगद राशि देने के बाद कहने लगे अभी 500 रुपए कम हैं बाद में दे देंगे।  एक जानकार सज्जन को हमने बिना शक़ के कंप्यूटर ले जाने दिया।  2 महीने बाद भी पैसे नहीं आये तो हमने उनको कॉल किया और याद दिलाया तो वो कहने लगे दे देंगे।  समय समय पर कॉल करने के 6 महीने बीत जाने के बाद भी पैसे नहीं आये तो हमने एक आखिरी कॉल उनको किया और कहा कि हम आपके 500 रुपए माफ़ कर रहे हैं अब आपको नहीं देने होंगे और साथ में ये भी कहा कि ये एक कर्ज है और किसी ना किसी रूप में और कभी ना कभी आपको ये चुकाने होंगे।

ठीक उसके अगले दिन हमारे ही पड़ोस में एक अस्पताल में एक कंप्यूटर ख़राब हुआ और सर्विस के लिए हम गए।  कंप्यूटर ठीक होने के बाद हमने डॉक्टर को 500 रुपए का बिल दिया।  ठीक उसी समय वही सज्जन अपने बेटे की बीमारी का टेस्ट कराकर डॉक्टर से मिलने आये और डॉक्टर की फीस जो 500 रुपए थी वो डॉक्टर को दी, डॉक्टर ने वही 500 रुपए का नोट हमें दे दिया। ठीक उसी समय हमने उस सज्जन से सिर्फ ये कहा आगे से ध्यान रखना।

ये एक संयोग भी हो सकता है लेकिन वो सज्जन उसी दिन हमारे 500 रुपए दे कर गए और माफ़ी मांगी। उनको शायद समझ आ गया कि ये एक कर्ज है जो चुकाना ही पड़ता हैं।  

अब वो 500 रुपए की बईमानी जो उन सज्जन ने की थी वो उनके और उनके बेटे के दुःख का कारण बनी। 

बात बहुत छोटी सी है बस समझ में आनी चाहिए।  जो समझ गया समझो अपने दुखों से मुक्त हो गया।  लेकिन ये चोरी बेईमानी सिर्फ पैसों की ही नहीं होती और भी बहुत कुछ है तो समझने की जरुरत हैं। जैसे हम लोग अपने रिश्तों को कितनी ईमानदारी से निभाते हैं।  जैसे हमको हमारे माता पिता हसतें खेलते बड़ा करते हैं।  हमारी हर जरूरतों को पूरा करते हैं।  ये उनका फर्ज है।  वो ये करते समय ये नहीं सोचते कि वो हमपर अहसान कर रहे हैं।  वो ये काम अपनी पूरी ईमानदारी से करते हैं।  अब एक उम्र के बाद जब उनको हमारी ईमानदारी की जरुरत होगी तो हमको भी अपने फर्ज निभाना चाहिए और ये नहीं सोचना चाहिए कि हम उनपर कोई अहसान कर रहे हैं। 

अब यहाँ पर वही ऊपर कही हुई बात दोहराना चाहता हूँ कि जो भी आप ईमानदारी से कमाते हो सिर्फ उसी पर आपका हक़ हैं।  अब अगर हम ईमानदारी से अपनी रिश्तों के फर्ज निभाते हैं तो ये हमारी ईमानदारी कि कमाई है।  इस बात में कोई शक नहीं रखना कि जब हमको ऐसी ही ईमानदारी की जरुरत होगी तो हमारी कमाई हुई ईमानदारी ही काम आयेगी।
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Shri Nangli Sahib Darbar