Difficulties and Success - कठिनाइयाँ और सफलता


जय श्री सच्चिदानंद जी 

कठिन परिस्तिथियों के बीच से स्वयं को गुजारना तपश्चर्या है और इस तपश्चर्या के माध्यम से व्यक्तित्व के परिष्कार की गति बहुत तेजी से होती है।  इसलिए प्राचीन समय से लेकर आज तक प्रायः सभी ऋषि-मुनि जंगलों में जाकर तप करते हैँ, कठिन परिस्तिथियों में जीवन जीते हैं।  जीवन के कष्टों को सहते हैं।  परमेश्वर का ध्यान, चिन्तन-मनन करते हैं और साधारण जीवन जीते हैं।  लम्बे समय तक ऐसा करने से उन्हें मनोवांछित साधना की सिद्धि प्राप्त होती है या निष्काम भाव होने पर उनका जीवन प्रकाशित हो जाता है।  

तप के सन्दर्भ में परमपूज्य गुरुदेव का कहना है कि "प्रकृति का नियम है कि संघर्ष से तेजी आती है।  रगड़ और घर्षण यद्यपि देखने में कठोर कर्म प्रतीत होते हैं, पर उन्हीं के द्वारा सौंदर्य का प्रकाश होता है।  जीवन वही निखरता है, जो कष्ट और कठिनाइयों से टकराता रहता है।  विपत्ति, बाधा और कठिनाईयों से जो लड़ सकता है, प्रतिकूल परिस्थितियों से युद्ध करने का जिसमें साहस है, उसे ही जीवन विकास का सच्चा सुख मिलता है।  आज तक इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ, जिसने बिना कठिनाई उठाए, बिना जोखिम ओड़े, क़ोई बड़ी सफलता प्राप्त कर ली हो।  कष्टमय जीवन के लिए अपने आप को ख़ुशी ख़ुशी प्रस्तुत करना, यही तप का मूलतत्व है।  तपस्वी लोग ही अपनी तपस्या से इन्द्र का सिंहासन जीतने में और भगवान का आसन हिला देने मेँ समर्थ हुए है।  मनोवांछित परिस्थतियां प्राप्त करने का संसार में एकमात्र साधन तपस्या ही है।  स्मरण रखिये सिर्फ वे ही व्यक्ति इस संसार में महत्त्व प्राप्त करते हैं, जो कठिनाइयों के बीच हंसना जानते हैं, जो तपस्या में आनंद मानते हैं। 

जय श्री सच्चिदानंद जी

Shri Nangli Sahib Darbar (Bhajan and Satsang) - Sant Vaani - 301 
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