यह जीवन क्षण भंगुर है



जय श्री सच्चिदानंद जी

हमारा यह जीवन क्षण भंगुर है, जीवन कि स्थिति बिल्कुल ऐंसे ही है, जैसे पेड़ो पर लगे हुए पत्ते टूट कर बिखर जाएं तो वापिस डाल पर नही लगते, नदी का पानी जो आगे बह जाए वापिस नहीं आता, मुख से निकला हुआ साँस दुबारा वापिस नही आता, प्रभात के समय पेड़, पोधों के पत्तों पर पड़ी ओंस की बूंदे थोड़ी देर के लिये तो दिखाई देती हैं, कुछ क्षणों के बाद न जाने कहाँ विलीन हो जाती हैं । इस दुनियाँ में न जाने कितने कितने लोग आते हैं, अपनी-2 बोलियाँ बोलते हैं, अपना-2 कर्म करते है ओर फिर इस आसार संसार से ऐंसे विदाई ले लेते हैं कि जाने वाले के निशान भी दिखाई नहीं देते, कि जाने वाला गया तो गया कहाँ । घर में, परिवार में, रिशते नाते वाले लोग पुकारते रह जाते हैं लेकिन कोई आवाज़ सुनता ही नही ।
 
पर हम सब जानते हैं कि ज़िन्दगी का कोई भरोसा नही, लेकिन आशचर्यजनक बात यह है कि इस चीज़ को जानने के बाद भी मानने को तैयार नही होते, दूसरे को समझा रहे होते हैं कि ज़िन्दगी का कोई भरोसा नही, स्वयं के लिये तो हम यही बोलते है कि अभी तो दुनियाँ मे रहना है, हम अभी जाएं गे नही संसार से, जबकि एक झटका आ कर लगे, एक ठोकर आ कर लगे, यह सारा सजा सजाया महल टूट कर बिखर जाए गा। इसलिये कहा जाता है कि –
 
आदमी का जिस्म क्या है, जिस पे शैज़ा है जहाँ,
एक मिट्टी की इमारत, एक मिट्टी का मकां,
खून का गारा बना, ईंट जिस में हड्डियाँ
चन्द स्वाँसो पे खड़ा है ये ख्याले आशियाँ
मोत की पुरज़ोर आंधी जब इसे टकराए गी
देख लेना ये इमारत खाक में मिल जाएगी

जय श्री सच्चिदानंद जी 
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Shri Nangli Sahib Darbar