जीवन में चार का महत्व - Four Things in Life


जय श्री सच्चिदानंद जी

१. चार बातों को याद रखे :-
बड़े-बूढ़ो का आदर करना, छोटों की रक्षा करना एवं उन पर स्नेह करना, बुद्धिमानो से सलाह लेना और मूर्खो के साथ कभी न उलझना।


२. चार चीजें पहले दुर्बल दिखती है परन्तु परवाह न करने पर बढ़कर दुःख का कारण बनती है :-
अग्नि, रोग, ऋण और पाप।

३. चार चीजो का सदा सेवन करना चाहिए:- सत्संग, संतोष, दान और दया।

४. चार अवस्थाओ में आदमी बिगड़ता है:- जवानी, धन, अधिकार और अविवेक।

५. चार चीजे मनुष्य को बड़े भाग्य से मिलते है:- भगवान को याद रखने की लगन, संतो की संगती, चरित्र की निर्मलता और उदारता।

६. चार गुण बहुत दुर्लभ है :-
धन में पवित्रता, दान में विनय, वीरता में दया और अधिकार में निराभिमानता।

७. चार चीजो पर भरोसा मत करो :-
बिना जीता हुआ मन, शत्रु की प्रीति, स्वार्थी की खुशामद और बाजारू बाबाओ की भविष्यवाणी।

८. चार चीजो पर भरोसा रखो :-
सत्य, पुरुषार्थ, स्वार्थहीन और मित्र।

९. चार चीजे जाकर फिर नहीं लौटती :-
मुह से निकली बात, कमान से निकला तीर, बीती हुई उम्र और मिटा हुआ ज्ञान।

१०. चार बातों को हमेशा याद रखे :-
दूसरे के द्वारा अपने ऊपर किया गया उपकार, अपने द्वारा दूसरे पर किया गया अपकार, मृत्यु और भगवान।

११. चार के संग से बचने की चेस्टा करे :-
नास्तिक, अन्याय का धन, पर (परायी) नारी और परनिन्दा।

१२. चार चीजो पर मनुष्य का बस नहीं चलता :- जीवन, मरण, यश और अपयश।

१३. चार पर परिचय चार अवस्थाओं में मिलता है :-
दरिद्रता में मित्र का, निर्धनता में स्त्री का, रण में शूरवीर का और मदनामी में बंधू-बान्धवो का।

१४. चार बातों में मनुष्य का कल्याण है :-
वाणी के सयं में, अल्प निद्रा में, अल्प आहार में और एकांत के भवत्स्मरण में।

१५. शुद्ध साधना के लिए चार बातो का पालन आवश्यक है :-
भूख से कम खाना, लोक प्रतिष्ठा का त्याग, निर्धनता का स्वीकार और ईश्वर की इच्छा में संतोष।

१६. चार प्रकार के मनुष्य होते है :-
(क) मक्खीचूस - न आप खाय और न दुसरो को दे।
(ख) कंजूस - आप तो खाय पर दुसरो को न दे।
(ग) उदार - आप भी खाय और दूसरे को भी दे।
(घ) दाता - आप न खाय और दूसरे को दे।
यदि सब लोग दाता नहीं बन सकते कम से कम उदार तो बनना ही चाहिए।

१७. मन के चार प्रकार है :-
धर्म से विमुख जीव का मन मुर्दा है, पापी का मन रोगी है, लोभी तथा स्वार्थी का मन आलसी है और भजन साधना में तत्पर का मन स्वस्थय है।

जय श्री सच्चिदानंद जी 
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Shri Nangli Sahib Darbar