Inspiration - प्रेरणा

यह एक स्वाभाविक सी बात है कि अपने से अधिक दूसरों के पास धन देखते हैं तो हम भी धनवान बनने की इच्छा में संलग्न हो जाते हैं।  किसी का यश और कीर्ति अधिक देखते हैं तो अपनी मान प्रतिष्ठा बढ़ाने की चिंता लग जाती है और यदि यह देखने और सुनने को मिले कि उस व्यक्ति ने अध्यात्मवाद में इतनी प्रगति की है तो हमारे मनों में भी इस याचना की चिंगारी भड़क उठती है कि हम भी अध्यात्मवाद में वैसी ही प्रगति कर सकें।  यह एक स्वाभाविक सी प्रेरणा होती हैं। जिससे शायद ही कोई मनुष्य बच सके।  देखा जाये तो जीवन की सारी चमक-दमक इसी प्रेरणा का फल है।  जिनमें यह प्रेरणा नहीं वह न प्रगति कर सकते हैं और न उन्होंने कभी की है।  उन्नति के मार्ग केवल उनके लिए ही खुलते आये हैं जो प्रेरणावश अपनी भरपूर शक्ति से एक धयेय की प्राप्ति के लिए जुट जायें।  भगवान् कृष्ण के शब्दों में प्रेरणा और याचना ही न केवल जीवन का संचार करती हैं बल्कि विश्व भर में जो कुछ दिखाई देता है, इसी स्वधर्म का पसारा है।  इस सिमटी हुई शक्ति थी जिसने जब आँख खोली तो विश्व के कण-कण में जीवन अंगड़ाई लेने लगा।  सृष्टि रचना इसी ईश्वर प्रेरणा का दूसरा नाम है।  अपने ही जीवन को देख लीजिये हम जागते हैं तो हमारा संसार जाग उठता है।  हमारे सारे जीवन के नाते, हमारे सब काम-काज, प्रातः से संध्या तक, विश्राम की एक घडी तक न देने वाली, अशांति भरे जीवन का कोलाहल उतनी देर तक ही विस्तृत होता है जब तक हम विस्तृत होते हैं।  इधर हमने आँख बंद की, उधर हमारे संसार की आँख लग गई।  हमारी शक्ति से ही सब शक्तियां कार्य कर रहीं थीं। दोनों के मिलन से एक ऐसा नया संसार प्रगट हो गया था जो हमारा ही बनाया हुआ था।  ज्यूँ-ज्यूँ हमने एक संसार अधिक ध्यान दिया तयूँ-तयूँ यह संसार और फैलता चला गया।  मृत्यु की बात तो बहुत लंबी बात है, हर शाम सोते समय हम इस सारे संसार को, अपनी सारी शक्तियों को नींद आते ही समेट लेते हैं  और फिर सवेरे आंख खोलने के पश्चात जब चैतन्य शक्ति अंगड़ाई लेती है तो फिर वही संसार, जो हमारा अपना रचा हुआ था, बाहें खोलकर हानि और लाभ, यश और अपयश, सुख और दुःख के तमाशे दिखाकर हमारा स्वागत करता हैं। इधर हमारा ध्यान इस संसार में फंसा इधर उस संसार ने और भी विस्तार पाना आरम्भ कर दिया और फिर आनंद की बात तो यह है कि हर पुरुष, हर स्त्री और हर बच्चे का ही नहीं, हर व्यक्ति का एक अपना संसार है, जिसे वह स्वयं ही रचता है।  अपना सारा जीवन उस संसार के बनाने और बिगाड़ने में व्यतीत कर देता है और फिर वह जो दूसरों का तमाशा देख रहा था, स्वयं एक तमाशा बनकर इस संसार से उठ जाता है। 
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Shri Nangli Sahib Darbar
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