🙏 आत्मा मालिक 🙏

।। घी ।।
शिष्यों ने गुरू से पूछ ही लिया - भगवन् , नष्ट होने वाले इस शरीर में नष्ट ना होने वाली आत्मा रहती कैसे है ?

सदगुरू ने शिष्यों को समझाते हुये कहा - दूध उपयोगी तो है परंतु वह एक ही दिन के लिये , फिर तो वह बिगडने लग जाता है । अब इसी दूध में यदि एक बूंद छाछ डाल दें तो यह दूध- दही बन जाता है परंतु यह भी केवल एक और दिन टिकता है । यदि इसी दही का मंथन करें तो यह दही - मक्खन बन जाता है , पर यह भी एक और दिन टिकता है । अन्त मे यदि इस मक्खन को उबालें तो यही मक्खन - घी बन जाता है और यह घी कभी भी नहीं बिगडता ' एक दिन में बिगडने वाले दूध में ना बिगड़ने वाला घी छिपा ही हुआ है '

इसी तरह इस शाश्वत शरीर में शाश्वत आत्मा रहती है ।

मानव शरीर ही दूध है , देव का स्मरण छाछ है , सेवा भाव ही मक्खन है और साधना करना ही घी है ' मानव शरीर को साधना से पिघलाने पर आत्मा पवित्रता प्राप्त करती है '

जय श्री सच्चिदानंद जी 
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Shri Nangli Sahib Darbar