🌻 Introspection 🌻 आत्ममंथन 🌻


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भक्ति में समर्पण पहली शर्त है.

समर्पण यानी संपूर्ण रूप से उसके अधीन हो जाना.
उसकी रज़ा में राज़ी रहना. जो वो दे. जो भी फ़ैसला ले.
हमें फिर नानुकर करने की कोई सहूलियत नहीं.
सुखमिले तो भी, दुख मिले तो भी. सब स्वीकार है.

लेकिन हम करते बिल्कुल उल्टा हैं.
अपनी ओर से फ़ैसले लेकर पर्ची उसे पकड़ा देते हैं
कि येये काम मेरे कंपल्सरी तूने पूरे करने हैं,
इसलिये कि मैंने तेरे दर पर हाजरी लगायी है
प्रसाद या चढ़ावे की रिश्वत देकर.

अब तू ना नहीं कर सकता. तुझे ना नहीं करना चाहिए.
छटांक भर देकर मन भर हासिल कर लेना चाहते हैं.
उस पर श्रद्धा पूरे टाइम सिरे से ग़ायब रहती है.
मालिक के साथ हम नौकरों जैसी डील पर उतर आते हैं.
भक्ति में हम ख़ुद को ऊँचे स्थान पर बिठा लेते हैं.

ख़ुद को मालिक मान बैठते हैं, उसे नौकर.
मालिक की बात अब नौकर को माननी ही चाहिए.
प्रार्थना नहीं करते उसके आगे, उसे आदेश देते हैं कि ये करो.
अपनी मर्ज़ी मनवाना चाहते हैं.

न माने वह, तो कहीं गहरे से चोट लगती है.
आहत होकर तब हम फिर नास्तिकता ओढ़ लेते हैं.
हमारा भगवान पर से यक़ीन उठ जाता है.
गोया यक़ीन न हुआ, चूंचूं का मुरब्बा हो गया.

यह समर्पण नहीं है.
समर्पण में उसके फ़ैसले पर तो हमें आनंदित हो जाना चाहिए.
तुम आनंदित नहीं होते, बल्क़ि शिक़ायतों से भरे रहते हो.
और इन शिक़ायतों का न कोई ओरछोर रहता है, न अंत.
एक ख़त्म होती नहीं कि दूसरी उग खड़ी होती है.
इसलिये कि तुम ज़िंदगी से संतुष्ट नहीं हो.

असंतुष्टि में जैसे तैसे जीवन यापन कर रहे हो.
बहुत ख़्वाब पाल रक्खे हैं अपने भीतर.
बहुतकुछ पा लेना चाहते हो थोड़े में.
अपनी लियाक़त से ज़्यादा.
इस पर ब्रेक लगाओ और उसकी रज़ा में
पूरी तरह से राज़ी रहना सीखो.

भक्ति में डीलिंग का कहीं कोई वजूद नहीं होता.
तुम ख़ुद को उसके समर्पण करदो. ख़ुद को उसे सौंप दो.
आगे तुम्हारे बारे जो वह फ़ैसला ले.
वही शिरोधार्य है. होना भी चाहिए.
यह होती है भक्ति.

🌻जय श्री  सच्चिदानंद जी 🌻  
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