योनी का खेल

जय श्री सचिदानंद जी

एक राजा था उसे पांच वर्षीय पुत्र के रूप में एक ही संतान थी।एक दिन राजा दुसरे राज्य में किसी काम से गया था, उसके पीछे कुछ चोर उसके पुत्र को उठाकर ले गए। यह जानकर राजा दुःखी हूआ और अपने पुत्र को खोजने की काफी कोशिश की लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।

समय बीतता गया करीब पंद्रह साल बाद राजा अपने महल के अंदर खडा रहकर बाहर देख रहा की महल के बाहर एक जवान भिक्षुक भिक्षा मांग रहा था।

यह देखकर राजा अचानक हैरान हो गया, उसे उस भिक्षुक मे अपना बेटा नजर आने लगा वहीं नैन नक्श अपने जैसा तेजस्व दिखाई दे रहा था ,राजा किसी को भूल सकता है लेकिन एक पिता अपने पुत्र को नहीं भूल सकता है।

राजा उससे मिलने को आतुर हो गया

लेकिन पहले यह बात अपने वजीर को बतायी। वजीर ने राजा से कहा आप जो कह रहे वो सही हो लेकिन उस भिक्षुक को सीधे-सीधे यह नहीं बता सकते हैं कि वो एक राजकुमार है शायद हमपर यकीन ना करे या यह सुनकर खुशी के मारे कोई सदमा पहुंचे, क्योंकि वह भिख मांगते मांगते अपना अस्तित्व खो चुका है।उसका जमीर मर चुका है किसी ने भीख दि तो किसीने गालियाँ उसके फटे वस्त्र यही दर्शाते है कि यह सब कुछ भूल चुका है वर्ना अपने महल के बाहर खडा रहकर भीख नहीं मांगता।

वजीर ने राजा से कहा पहले इसे महल में काम पर रखते और काम करते करते शायद कुछ याद आ जाये कुछ हम याद दिलाते जायेगे।

पहले वह भिक्षुक महल मे अंदर आने से कतरा रहा था, उसे लगा महल के बाहर भीख मांगकर कोई गुनाह किया है।जब उसे यह समझाया गया कि उसे सजा नहीं महल मे काम करने का मौका दिया जा रहा है।पहले महल की साफ सफाई का काम दिया गया , धीरे-धीरे उसकी काम बढोत्तरी करते गये, एक दिन उसे वजीर बना दिया और एक दिन उसे भी यह जगह जानी पहचानी लगी तो तब याद दिलाया गया कि वह नौकर नहीं एक राजकुमार है तो तब इस बात पर यकीन हुआ।

हमारी हालत भी उस भिक्षुक जैसी ही है। हम योनियों बदलते बदलते अपना अस्तित्व भुल गये है। हम भी उस परमात्मा की संतान हैं। यह भेद बताने के लिए सतगुरु हमें पहले साफ सफाई का काम देते हैं। विषय विकारो का मैल दूर यह नित नेम सतसंग मे जाने से और भजन सुमिरन की करने से हमारे मन का मैल कम होता जाता है, और इस तरह एक एक की बढोत्तरी करते करते एक दिन हमे ज्ञान हो जाता है कि हम परमात्मा के ही अंश है।

जय श्री सचिदानंद जी

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